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COOL-TA BY Khizar Syed

चौबीस बरस हो गये इस धरती पर। पर आज मुझे समझ आया के मैं ‘कूल’ नही हूँ। कूल मतलब ठंडा नही। कूल मतलब कूल।
“कूल कोई बताने वाली फील नही है। ये बस आ जाती है। यू नो।” किसी कूल ने मुझे कहा था।
पहले-पहेल तो हमें कूल ही समझ नही आया। लौंडा अगर ज़्यादा कूल लगने लगे तो हॉट हो जाता है। हॉट की तो हमनें कभी सोची नही पर पहले हम आखिर ये तो समझे के कूल आख़िर बला क्या है?

हमें वक़्त लगा दिल मे बैठने में के हम कूल नही है..नही है.. नही है। पर दोस्त तुम बन सकते हो। हम अन-कूल, हमनें कूलनेस को खोजने के लिए कूल लड़को मे बैठना शुरू किया। समझ आया के लड़कियो की तो बात छोड़ो कूल लड़के भी हमारे साथ बैठना पसंद नही करते। ख़ैर, तो हम जैसे तैसे कूल ग्रूप..नही..नही..स्क्वाड में बैठने लगे। हम चुप चाप उनकी बातें सुना करते और फिर मोबाइल पर नोट करते रहते और खिसयानी हँसी हँस दिया करते। सबसे ज़्यादा कूल ‘डूड’ को हमनें मन-ही-मन गुरु द्रोणाचर्या मान लिया था। फ़क। नॉट गुरु द्रोणाचार्य, मे बी रियल शिट। शिट ऐ एफ़। हम ऐसे ही कूलनेस की प्रैक्टिस भी कर लेते थे जैसे मिलते ही ज़ुबान घसड़कर ‘वज़्ज़प’ कहना है। और दूर से हाथ लाकर दूसरे से हाथ मिलना या दाएं कंधे का बाएँ कंधे से टकराना। हर वक़्त डूड डूड कहते ना थकना। लड़कियाँ अगर बातूनी है तो साइड हग कैसे करना है? सेल्फीज़ किस वक़्त लेनी चाहिए। फिर सेल्फीज़ भेजने के बहाने नंबर कैसे माँगना है? हम ये सब कर तो नही रहे थे पर छुप-छुपके देख रहे थे और सीख भी रहे थे।
कूल।

सातवीं- आठवीं तो हमनें भी अँग्रेज़ी स्कूल मे पढ़ी थी और ग्रेजुएशन भी इंग्लिश मीडियम में किया है पर अँग्रेज़ी का मतलब कूल नही। बहुत-बहुत सस्ती अँग्रेज़ी मे थोड़ी-थोड़ी हिन्दी के भारी-भारी शब्द डाल देना कूल है जैसे “आई वाज़ फ्रीज़ड लाइक मौत। यू नो इट वाज़ सो मच ठंड ना। फक इट ब्रो!” इसमें खेल बहुत तेज़ अँग्रेज़ी बोलने का नही, इतराते और लहराते हुए तरीके से बोलने का है। जैसे “यू नो, आई वाज़ लाइक.. आई लव इट.. आई रेअल्ली रेअल्ली रेअल्ली हेट इट.. लिटरली”। और ‘भाई’, ‘दोस्त’ को अपने परचून की दुकान पर छोड़कर बस ‘ब्रो’, ‘डूड’ बिना किसी भेदभाव के सबको बोलो। हमें समझ आया के लड़कियों को अगर गलती से ‘बेब’ बोल दिया तो कूल-ता का स्तर धड़ाम से गिर जाता है।

किस्मत बुरी थी के लड़कियों से पाला सिर्फ़ एग्जाम में पड़ता था, जो एग्जाम हॉल से बाहर जाकर अजनबी बन जाती थी। हमारे ग्रुप मे लड़कियाँ होती भी तो हम एक छोर पे तो वो दूसरे छोर पर। कभी ग़लती से दोनों अकेले रह जाते तब हमारें फेंफड़ो का मोटर इंजन भभकने लगता और मुँह में भाटे आ फँसते।
एक दिन ऐसा हादसा हो ही गया।

“सो…यू आर?” उसनें झटक कर मुझसे पूछा।
“मेरा? मेरा नाम ..नाम?” अपने नाम पर हम किसी पहाड़ की ट्रेकिंग करके पहुँचते तब तक वो अपने मोबाइल मे मगन हो जाती।
पाँच मिनिट बाद हमें ख़्याल आता के अरे!उसका भी कुछ नाम होगा।
“और तुम्हारा?” मैंने कूल बन्ने के अंदाज़ में पूछा और अथा नशेली मुस्कान साधकर सोफ़े पर टेढ़े होकर हाथ रखा।
“शिवि”

“ओह! नाइस नेम।”

बस अच्छा भला कूल बनने वाले डगर पर पुल पाँव तले टूट गया।
“‘नाइस’ का मतलब तारीफ नही बुराई होती है डूड!!” मेरे अंदर पैदा हुआ कूल बन्दा मुझ पर गरियाने लगा।
“नॉर्मल। वैसे नॉर्मल ही तो था नाम।” मैंने मेरे अंदर के कूल को जवाब दिया।

“फ़क मैन। आर यू किडिंग मी? उसको स्पेशल फील करना ही तो कूल-नेस है ब्रो।” ये बोलकर मेरे अंदर का कूल चुप हो गया।
हमनें कूल बनने की एक और कोशिश की।

“सो। व्हाट यू डू? तो तुम क्या करती हो?”
“मेडिकल।”
“ओह ग्रेट। किसमें?”
“डेंटल। यू नो बी डी एस।”
“या! पर डेंटिस्ट तो डॉक्टर नही होते ना?” मैं कूल-पना भूलकर, ये मासूमना सवाल पूछ बैठा।

“सॉरी?”

“नाह। इट्स ओके।”

अगर उसकी वर्जिन मोजितो की जगह तेज़ाब होता तो वो मेरे मुँह पर दे मारती पर अन-कूल लड़कों को कुछ ना बोलना ही बहुत कुछ बोलना होता है। वो वॉशरूम का “एक्सक्यूस मी” कहकर मेरे बगल से तपाक से चल दी।

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