badge

Masjid Ka Lauta

“नमाज़ नहीं पढ़नी क्या?”
चाचा फ़ज़ल बक़्श ने मुझे नींद से उठाते हुए कहा।
“जी। शुक्रिया उठाने के लिए”
मैंने अपने हाथों से आँखों को साफ करते हुए जवाब दिया।
“चलो मुँह धो लो, मैं चाय बना देता हूँ”
चाचा ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
पिछले साल ही दिल्ली आया था इलाहाबाद से। आने के कुछ वक़्त बाद ही एक ठीक-ठाक सी नौकरी मिल गयी थी। घरवालों ने सख़्त ताक़ीद की थी के कमरा अपने लोगों के दरमियाँ ही लेना है, खाने पीने की सहूलियत और अपने लोग होंगे तो दो बात मज़हबी भी होंगी, और आड़े वक़्त में काम भी अपने लोग ही आते हें।
चाचा फ़ज़ल बक़्श बड़े ही नेक दिल इंसान हैं, उनका बेटा सऊदी अरब में नौकरी करता है और अहलिया इन्तेक़ाअल फर्मा चुकी हैं। तो मियाँ यहाँ अकेले होते हैं। चूँकि उपर वाला कमरा खाली भी था या यूँ कहिए मैं जब आया था तो उन्हें लगा कोई बात करने वाला भी मिल जाएगा तो मुझे कम किराए मे ही उपर वाला कमरा दे दिया।
खाना वगैरह मैं कभी बाहर से ले आता था तो कभी हम दोनों मिलकर ही बना लेते थे। दरअसल हम दोनो के शौक़ काफ़ी मिलते भी थे, दोनों को ही शायरी का शौक़ था तो कभी दाग़ तो कभी मोमिन के कलाम के साथ खाना कब बन जाता, पता ही नही चलता।
“वुज़ू मस्जिद में करना, ज़्यादा सवाब मिलता है”
हँसते हुए चाचा बोले “और हाँ!अल्लाह मियाँ को मेरा भी सलाम कहना”
मस्जिद पहुँचा तो बड़ा मेला लगा था, लोगों की बस ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी।
अरे भाई। अह्ल ए फज्र क्या हो गया? नमाज़ पढ़ने आए हो अल्लाह का नाम लो। फिर किसी ने बताया
“अमाँ ग़ज़ब हो गया! ये दुनिया जहन्नम का रास्ता तलाश रही है।”
“तो मिला?” मैंने पूछा।
अंदर गया तो कुछ असली मुसलमान एक जमात में खड़े थे और मौलवी साहब अपना सा मुँह लेकर, सर झुकाए।
सब खैरियत तो है? सोच ही रहा था कि हाजी जी बोले, “जहन्नम में जलोगे मियाँ! मस्जिद का लौटा चुरा के बेच दिया, कितने का बिका?”
“10 रुपये” मौलवी जी खिसिया कर बोले।
“ला हॉल बिला क़ुव्वत। 10 रुपये में ईमान बेच आए। अल्लाह को ये काला मुँह दिखाओगे?”
“अरे आज तो मैने देख लिया, पता नही क्या-क्या अल्लाह का माल ज़ब्त किए बैठा है ये नामाकूल!” एक खश्खशि  दाढ़ी वाले मुसलमान ने अपने जिगर को थाम के कहा।
“बिल्कुल अब्दुल हक़ साहब!” हाजी जी ने उनकी सफ़ में शामिल होते हुए कहा।
मस्जिद के दालान में घर तो नही कह सकते, हाँ एक नुमाया सा टिन का कैबिन बना हुआ था उसमें से आवाज़ आई
“अब्बा! अम्मी को दवाई दूध से दूँ या पानी से?”
“लो हराम के पैसे का दूध पीयेंगे” एक और इज़्ज़तदार मुसलमान ने अब्दुल हक़ साहब की तरफ इशारा करते हुए कहा।
“देखो मियाँ! अस्र तक करो मस्जिद खाली। उठाओ अपना ये जहन्नमी सामान। हम इब्लीस की औलाद के साथ क़तई नमाज़ ना पढ़ेंगे।”
मौलवी साहेब बेचारे क्या करते, नज़र नही उठा पा रहे थे।
नमाज़ कहाँ, अब यहाँ तो नुक्कड़ जमात हो गयी, मैं ऐसे ही घर वापस आ गया तो चाचा बोले
“बड़ी जल्दी बक़्शिश हो गयी?”
मैने पूरा वाक़्या बताया तो वो हँसते हुए बोले
“बिस्मिल्लाह, खैर मक़दम”
मै कुछ समझा भी नहीं और सीधा उपर कमरे में आके लेट गया। मैं बस ये सोच रहा था के क्यूँ आख़िर इस शख़्स को ये काम करना पड़ा होगा? क्या सच में इसके ज़िम्मेदार मौलवी साहब हैं?
या
हमारा मा’शरा?
You may also like:  Confession Kumar

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please wait...

Subscribe to our newsletter

Want to be notified when our article is published? Enter your email address and name below to be the first to know.
Read previous post:
Ek Almaari Thi
Ek Almaari Thi

एक अलमारी थी बड़ी खूबसूरत घर में जो भी आता उसी की तारीफ करता उसी के पास बैठना पसंद करता

Jashn-e-adab
Jashn-e-Adab: Come Bask in the Festivities of Language Culture and Heritage

[Tweet "Urdu Hai Jiska Naam, Humin Jaante Hain ‘Daagh’, Saare Jahan Mein Dhoom Hamari Zaban ki Hai"]   Jashn-e-Adab is

Close