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Ek Almaari Thi

एक अलमारी थी बड़ी खूबसूरत
घर में जो भी आता उसी की तारीफ करता
उसी के पास बैठना पसंद करता
अलमारी भी कुछ कम ना थी
पहला खाना दूसरा खाना तीसरा खाना
घर में जो भी कीमती चीज़ थी उन्ही खानों में रखी हुई थी
सबसे ऊपर वाले खाने में कुछ कीमती किताबें जिनमे सबको पता था बहुत इल्म मौजूद है
दूसरे खाने में पैसे रखे जाते थे
अलमारी की एक ख़ास बात ये थी के पैसे कभी खत्म नहीं होते थे
जिसको भी ज़रुरत होती वो वहां से ले लेता
और पता नहीं कहाँ से वह वापस से पैसे आ जाते
पर हालाँकि अलमारी के तीसरे खाने में ताला लगा हुआ था कोई नहीं जानता था उसमे क्या है
या किसी को शायद उस खाने से कोई मतलब भी नहीं था
बहुत साल गुज़र गए अब अलमारी कुछ पुरानी हो गयी थी
पहले खाने में जो इल्म था अब उसे कोई पढ़ना नहीं चाहता था
और दूसरे खाने में पैसे भी आने लगभग बंद हो गए थे
बेटे की नौकरी लगी थी तो घर में नया फर्नीचर लाने की बात चल रही थी
अलमारी से हालाँकि पुछा नहीं गया था पर वो बातों बातों में भाप गयी थी के उसकी अब घर वालो को कम ज़रुरत है
तो वो कभी कभी अपनी ज़रुरत का एहसास दिलाने के लिए कुछ नाकाम कोशिशें किया करती थी
जिसपर घर के लोग हस्ते तो थे पर सिर्फ उसके पहले खाने के इल्म का मज़ाक उड़ाने के लिए
जबकि अलमारी ये जानती थी के उनको हँसने का इल्म भी इसी पहले खाने से मिला था
पर अलमारी भी लाचार थी तो वो भी एक खिस्यानी हँसी हंस दिया करती थी
पर घर वाले बड़े शातिर थे अलमारी को आज तक नहीं पता के उसका वो कमरा जिसमे कभी लोग आके बैठा करते थे और वो अलमारी बड़ी शान से अपने खानों का ज़िक्र किया करती थी और अपने तमाम घर वालो के लिए बाइस इ फक्र थी
आज एक स्टोर रूम में तब्दील हो चुका है

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